Holika Dahan 2026: बुराई पर अच्छाई की जीत का त्योहार होलिका दहन फल्गुन मास की शुरुआत में मनाया जाने वाला हिन्दू धर्म का महत्वपूर्ण त्योहार है। हिरण्यकश्यपु की बहन होलिका और उसके चार पुत्र प्रह्लाद, अनुहलाद, सहल्लाद और हल्लाद थे। जिसमें से प्रह्लाद सबसे बड़ा और हलाद सबसे छोटा पुत्र था। अहंकारी राक्षस हिरण्यकश्यपु स्वंय को भगवान समझता था। लेकिन प्रह्लाद श्रीहरि की पूजा में मग्न रहता था।

यह बात उसके पिता हिरण्यकश्यपु को कदापि पसंद नहीं आती थी। वह सोचता रहता कि उसका पुत्र श्रीहरि की पूजा अर्चना छोड़कर उसकी पूजा अर्चना करना शुरु कर दे। जब लाख कोशिशों के बाद वह अपने इरादों में सफल नही हुआ तब उसने प्रह्लाद को मारने की योजना बनाई। लेकिन प्रह्लाद को मारने की वह जो भी योजना बनाता वह सभी योजनायें असफल हो जाती थी। फिर एक दिन उसने अपनी छोटी बहन होलिका जिसको अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था उससे प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठ जाने के लिये कहा तो होलिका तैयार हो गई। और प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठ गई। जैसे ही वह अग्नि में बैठी प्रह्लाद श्रीहरि के नाम का जप करने लगा जिससे प्रह्लाद बच गया और होलिका जलकर भस्म हो गई।
जिसके बाद से प्रत्येक वर्ष फल्गुन मास के शुरु होते ही होली का त्योहार पूरे भारत में मनाया जाने लगा। बुराई पर अच्छाई की जीत का यह त्योहार बेहद धूमधाम से मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि होलिका जलने से पहले या जलने के बाद विधि विधान से पूजा अर्चना की जाय और जलती होलिका में सूखा नारियल, जौ, कपूर, हरी इलायची, लौंग और पान के पत्ते आदि पूजन सामग्री डाली जाय तो रोग दोष दूर होते है। जबकि गेहूँ की बालियां होलिका की अग्नि में डालने से घर में कभी भी आनाज की कमी नहीं होती। होलिका की अग्नि शान्त होने के बाद उसकी राख को घर में लाने से सकरात्मक ऊर्जा का वास होता है और नकरात्मकता समाप्त होती है।

