Chaitra Navratri 2026: नवरात्री के सातवें दिन माँ कालरात्री की पूजा की जाती है, माँ दुर्गा का सातवां रुप दुखों और दैत्यों का नाश करने वाला अपने भक्तों की रक्षक माँ कालरात्री का रुप अत्यंत विकराल है। माता काली और कालरात्री देवी दोनों अलग- अलग रुप है। महाकाली देवी पार्वती जी के उग्र रुप माता कौशिकी के क्रोध से चण्ड मुण्ड के वध करने के लिये प्रकट हुई थी। जब चण्ड मुण्ड राक्षस ने माता कौशिकी का वध करना चाहा तब उन्होंने अपनी भौहों से महाकाली को प्रकट किया था। महाकाली चण्ड मुण्ड का वध कर चामुंडा बनी और चण्ड मुण्ड राक्षस का गला काट कर माता कौशिकी के समक्ष पेश किया।

दस विद्याओं में परागंत महाकाली, दक्षिणाकाली, श्मशान काली, भद्रकाली और चामुंडा आदि रुपों के साथ क्रोधित रुप में भगवान शिव के ऊपर अपने चरण कमल रखकर विराजित है। महाकाली गले में मुण्डों की माला और अपनी चार भुजाओं में चण्ड मुण्ड राक्षस का कटा सिर, खप्पर, तलवार और त्रिशुल धारण किये है महाकाली की आठ और दस भुजाओं वाला रुप उनके उग्र रुप को प्रदर्शित कर रहा होता है।

जबकि कालरात्री नौ दुर्गा के शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, महागौरी और सिद्धिदात्री में से एक रुप है। माँ कालरात्री गले में विधुत उत्पन्न करने वाली माला धारण किये है। इनका वर्ण अमावस की रात्री की तरह प्रतीत होता है। गधे पर विराजित इनका उग्र रुप केवल दुष्ट और दैत्यों के विनाश के लिये है इस लिये इन्हें शुंभकरी भी कहा जाता है। माँ भक्तों को भय, नकरात्मक शक्तियों से मुक्ति देकर साहस, बल सुख समृद्धि प्रदान करती है।
भक्तगण नवरात्री के सातवें दिन कालरात्री के साथ महाकाली का पूजन करते है। इस दिन मध्यरात्री की पूजन विशेष फलदायी मानी जाती है। माँ को गुड़हल का पुष्प, रोली, अक्षत, कुमकुम आदि चढ़ाकर, गुड़ की मिठाई का भोग लगाने से देवी अत्यंत प्रसन्न होती है और भक्तों को मनोवांछित फल देकर रोग, दोष शत्रुओं से मुक्ति देती है।
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(भक्तगण इस लेख में लिखित बातों को अपने मनोभावों के अनुसार ग्रहण करें)

