Shaheed Diwas: हम रहे या न रहे, लेकिन देश आजाद रहे यह शब्द मात्र शब्द नही लगते है, यह देश की आजादी के लिये वीर क्रांतिकारियों के दिलों में उठने वाले तूफानों की कहानी बंया करते है। हमारे भारत देश को ब्रिटिश सत्ता से मुक्त करवाना इतना आसान नही था। इसकी आजादी के लिये क्रांतिकारियों ने अपने खून का कतरा कतरा निकाल कर सोने की चिड़ियाँ कहे जाने वाले देश को ब्रिटिश शासन से मुक्त करवाया। देश के निहत्ते क्रांतिकारियों को ब्रिटिश शासन ने अपनी हुकुमत और बेबुनियादी नीतियों से जकड़ने का भरसक प्रयास किया था। लेकिन उनके सभी प्रयास असफल रहे और हमारा भारत देश ब्रिटिश हुकुमत के बंधनों से मुक्त होकर सोने की चिड़ियाँ कहे जाने वाले देश की ओर फिर से अग्रसर हो चला।
सुखदेव, भगत सिंह और राजगुरु भारत देश के तीन ऐसे महान् क्रांतिकारी रहे जिन्होंने हसते हसते देश की आजादी के लिये अपने प्राणों की आहूति दे दी थी। जिनकी याद में दिनांक 23 मार्च दिन सोमवार को संपूर्ण देश शहीद दिवस के रुप में मनाया गया। पंजाब में जन्में मात्र 23 वर्ष की उम्र में शहीद होने वाले भगत सिंह भारत के सबसे युवा क्रांतिकारी नेता के रुप मे जाने जाते है। क्रांतिकारियों के प्रमुख नेता पंजाब नेशनल बैंक और पत्रिका द पिपुल के संस्थापक रहे लाला लाजपत राय की हत्या ब्रिटिश शासन कर चुका था।
ब्रिटिश शासन का आतंक इस कदर बढ़ गया था भारत देश के लोगों को उनके ही देश में जीना मुश्किल था। आजादी की अलख जगाने के लिये वीर क्रांतिकारी भगत सिंह नें राजगुरु और सुखदेव के साथ मिलकर लाहौर षणयंत्र कांड और ब्रिटिश पुलिस अधिकारी सॉन्डर्स की हत्या को अंजाम दिया। जिसके लिये ब्रिटिश शासन ने अपनी झूठी शान को हवा देने लिये तीनों क्रांतिकारियों को फांसी की सजा सुनाई और इन तीनों वीरों ने फांसी के फंदे को देश की आजादी के लिये चूम लिया।
ब्रिटिश शासन द्वारा फांसी की सजा तारीख 24 मार्च निर्धारित की गई थी लेकिन जनता को धोखा देते हुये जनसैलाब के आक्रोश से खुद को बचाने के उद्देश्य से ब्रिटिश शासन ने वीर क्रांतिकारियों को 23 मार्च 1931 को ही फांसी दे दी थी। इन वीर क्रांतिकारियों की कुर्बानी को संपूर्ण देश नम आँखों से नमन करते हुये शहीद दिवस के रुप में मनाया।
…समाप्त….

