Jagannath Yatra 2026: भगवान को जगत का स्वामी इस लिये भी कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण जगन्नाथ रुप में अपनी गोल बड़ी आँखों से पूरी सृष्टि पर अपनी निगरानी बनाये रखते है। मान्यता है कि जगतविधाता श्रीकृष्ण को पुरी के लोग नीले पत्थर के रुप में पूजा करते थे। काष्ठ की जगन्नाथ, बालभद्र और सुभद्रा की रहस्यमयी मूर्तियों के निर्माण के बाद लोग इनकी पूजा करने लगें।
भारत देश तीर्थ स्थलों का देश है। इन स्थलों पर आस्था और इतिहास का अद्भुद मिल देखने को मिलता है। इनमें से सबसे प्रमुख ओडिसा का पुरी तीर्थ स्थल है। यहाँ की रहस्यमयी मूर्तियों को देखने पर इनसे जुड़े राज गहराते चले जाते है। पुरी में बालभद्र देवी सुभद्रा और जगन्नाथ की सभी मूर्तिया आधी अधूरी बनी है। इन मूर्तियों के हाथ और पैर नहीं है।
पुरी की मूर्तियों में भगवान श्री कृष्ण की ह्दय करता है, निवास
कुछ कथाओं के अनुसार कहा जाता है मूर्तिकार राजा इंद्रद्युम्न को स्वप्न में भगवान श्रीकृष्ण ने दर्शन देकर कहा था कि वे समुद्र से बहकर आयी हुई एक लकड़ी से मूर्ति बनाएँ। माना जाता है कि उस उस लकड़ी में भगवान श्रीकृष्ण का ह्द्य विराजमान था।

श्रीकृष्ण ने राजा इंद्रद्युम्न से स्वप्न में यह भी कहा कि 21 दिन से पहले इन मूर्तियों को बनते हुये कोई नहीं देखेगा। लेकिन मूर्तियां पूर्ण होने से पहले ही 14वें दिन रानी ने मूर्तियां बनते हुये देख लिया जिसके बाद शिल्पकार अर्तध्यान हो गये। और मूर्तियां आधी बनी रह गयी। तभी से भगवान जगन्नाथ बालभद्र और देवी सुभद्रा अधूरे रूप में ही पूजे जाते हैं।
“नवकलेवर” परंपरा के अनुसार नई काष्ठ की मूर्तियाँ की जाती है, स्थापित
पुरी में प्रत्येक 12 से 19 वर्ष के बाद “नवकलेवर” परंपरा के अनुसार पुरानी मूर्तियों को बदलकर नई काष्ठ की मूर्तियाँ पुनः स्थापित कर दी जाती हैं।
जगन्नाथ का अर्थ है जगत के नाथ पूरे संसार के भाग्यविधाता स्वामी। पुरी का जगन्नाथ मंदिर लगभग 900 साल पुराना है। इसे 12वीं शताब्दी में राजा अनंग भीमदेव ने बनवाया था। मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ पर स्थापित सभी मूर्तियाँ लकड़ी की हैं।
भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा है, विश्व प्रसिद्ध पर्व
भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा विश्व प्रसिद्ध पर्व है। माना जाता है प्रत्येक वर्ष आषाढ़ माह में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा सुंदर रथों पर विराजित होकर 3 किलोमीटर अपनी मौसी के घर गुंडिचा मंदिर जाते हैं। 9 दिनों बाद वहाँ से वापस लौटते हैं। इस यात्रा में लाखों श्रद्धालु “जय जगन्नाथ” की जयकारा लगाते हुये रथ खींचते हैं और महाप्रसाद ग्रहण करते है। मान्यता है कि पुरी में 56 प्रकार के भोग मिट्टी के बर्तन में बनते हैं और वह भोग कभी कम नहीं पड़ते है।
कानपुर में बारिश की बौछारों में भगवान जगन्नाथ यात्रा का भव्य नजारा
देश दुनियां के अन्य शहरों के अलावा शहर कानपुर में भी प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी भगवान जगन्नाथ बालभद्र और देवी सुभद्रा के साथ रथ पर सवार होकर अपने भक्तों को दर्शन दिये। लेकिन इस वर्ष आंधी और बरसते पानी में शहरवासियों को जगन्नाथ भगवान के दर्शन प्राप्त हुये। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानों भगवान अपने भक्तों को आशीष देने के लिये बरसात कर रहे हो।

जिसमें शहर के जे.के. मंदिर की पावन भूमि पर बारिश में श्रद्धालुओं ने भीगते हुये रथ पर भगवान श्रीकृष्ण के जगन्नाथ रुप के दर्शन किये। इस रथ यात्रा में मुख्य अतिथि विधायक सुरेन्द्र मैथानी रहे। जे.के. मंदिर परिसर से सायं काल 4 बजे से शुरु हुई यह रथ यात्रा पिनैकल इंटरनेशनल स्कूल काकादेव से होकर जय जगन्नाथ का जयकारा लगाते हुये वापस सायंकाल 6 बजे जे.के. मंदिर परिसर कमला नगर में रथ पर सवार भगवान जगन्नाथ पुनः प्रतिस्थापित हुये।
कानपुर के नयागंज एवं जनरल गंज से लगभग 200 वर्ष पूर्व से निकाली जा रही यात्रा का आयोजन भी धूमधाम से किया गया। बिगड़ते मौसम में भी भगवान जगन्नाथ की इस यात्रा में भारी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुये। और सुन्दर झांकियों एवं भगवान जगन्नाथ के भव्यरुप के दर्शन पाकर प्रफुल्लित हुये।
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(पाठक वर्ग इस लेख में लिखित तथ्यों को अपने मनोभावों के अनुरुप ही ग्रहण करें यह किसी की धार्मिक भावना के ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से नहीं लिखे गये है। यह मात्र केवल जानकारी है)
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