Kanpur Nagar: जगत विधाता श्रीकृष्ण के बालरुप के नाम से जन्मा कान्हापुर 2026 तक लगभग अपने 819 वर्ष पूरे कर चुका है। माना जाता है कि 1207 में राजा कान्ह देव ने कानपुर नगर की स्थापना की थी। लेकिन कुछ इतिहासकारों के अनुसार कानूनी रुप से 1217 को कानपुर नगर के स्थापना वर्ष के रुप में मनाया गया था।
शहर के स्थापना वर्ष के समय कान्हापुर से कन्हैयापुर, करनापुर, पटकापुर, सीसामऊ, CAWNPUR जैसे नामों का सफर तय करते हुये अब यह शहर कानपुर नगर के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि ब्रिटिश कान्हापुर का उच्चारण ठीक से नही कर पाते थे। जिसके कारण ब्रिटिशों ने CAWNPUR कहना शुरु कर दिया था। 20 नामों का सफर तय करके धीरे-धीरे यह शहर कानपुर नाम से प्रचलित हो गया।
उत्तर प्रदेश के गंगा किनारे बसा ऐतिहासिक नगर कानपुर ने अपनी लगभग 819 वर्षो की यात्रा में कई उतार चढ़ाव देखे है। यह शहर अंग्रेजों के शासनकाल से लेकर, 1857 का स्वतंत्रता संग्राम में स्वतंत्रता सेनानियों की कुर्बानी और 1947 में आजादी के मंजर को अपने में समाहित किये है। पूरे नगर का दृश्य़ देखने से ऐसा प्रतीत होता है। मानों पूर्व का मैनचेस्टर कई बार उजड़ने के बाद अपनी विरासत को समेट कर फिर से खड़ा हुआ है।
आज औद्योगिक नगरी के नाम से प्रचलित शहर ने अपनी जमीनी जड़ों को मजबूती के साथ जकड़कर अपने 20 नामों के बदले रुप के साथ आज एक नये कानपुर के रुप में विस्तारित और विकसित है। जिसमें आज भी 7 ऐतिहासिक क्लॉक टावर कानपुर की शान और विरासत के महत्वपूर्ण हिस्सा बने हुये है।
शहर की समय सारणी निर्धारित करते थे, क्लॉक टावर
ब्रिटिश शासन काल के दौरान जब घरों में लोगों के पास घड़ी नहीं हुआ करती थी। तब मिलों में कार्य करने वाले मजदूर, व्यापारी और आम जनता को समय की जानकारी इन्हीं टावरों की क्लॉक से मिलती थी। ब्रिटिश इन टावरों को पावर और तरक्की का हिस्सा मानकर भी बनवाते थे। और पूरे शहर की समय सारणी इन्हीं टावर क्लॉक के बताये गये समय के अनुरुप निर्धारित होती थी।
कानपुर के इतिहास की कहानी सुनाती है, टावर क्लॉक
तकनीकी और मोबाइल के युग में भले ही टावरों की क्लॉक में लोग समय न देखते हो। लेकिन आज भी शहर के लैण्डमार्क घंटाघर और कमला टावर समेत 7 ऐतिहासिक टावर क्लॉक की टन-टन करती घंटियां समय की गति का आवह्न कराती थी और आज कानपुर शहर के इतिहास की कहानी सुनाती है।

लाल इमली क्लॉक टावर है, सबसे पुराना
लाल इमली का सबसे पुराने क्लाक क्लॉक टावर 1880 में सर एलेक्जैंडर मैकराबर्ट ने बनवाया था। यह मिल में कार्य करने वाले मजदूरों के लिये बनवाया गया था। जिसके बाद अन्य टावरों के बनवाये जाने की प्रेरणा इसी टावर से मिली थी। फिलहाल इसकी घड़ी लगभग 5 वर्षो से घड़ी बंद चल रही है और हाल ही के कुछ समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों के मुताबिक इसकी घड़ी की सुईयों में एक सुई के गायब होने की खबर भी सामने आई थी। जिसके न मिलने पर अभी भी जांच पड़ताल जारी है।
शहरवासियों द्वारा समय देखे जाने का केन्द्र था, गांधी भवन फूलबाग का टावर
दूसरा टावर फूलबाग गांधी भवन में 1911 में बनवाया गया था। यह मध्य क्षेत्र में होने के कारण शहर के सबसे अधिक लोगों द्वारा समय देखे जाने का केन्द्र था। इसकी घड़ी आज भी अपनी टिक-टिक से शहरवासियों को सटीक समय बताती है।

कोतवाली टावर क्लॉक की दूर तक सुनाई देती है, घंटी
वहीं 1925 में तैयार करवाया गया कोतवाली थाने में स्थित टावर शहर की सबसे पुरानी मार्केट में इसकी घंटी की आवाज बहुत दूर तक सुनाई देती है। जिससे स्थानीय लोग सही समय का अदांजा अपने घर की चार दीवारी के भीतर भी लगा लेते है।
राहगीरों को समय दिखाता पीपीएन मार्केट का टावर
तीसरा क्लॉक टावर शहर में परेड स्थित पीपीएन मार्केट बिजली घर में 1931 में बनवाया गया था। मिल एरिया के पास होने के कारण ब्रिटिशकाल में मिलों में कार्य करने वाले मजदूर आने जाने के समय को शीघ्रता से देख सकते थे। वर्तमान समय में भी राहगीर इसमें समय को अपनी गति से चलते देख सकते है।
लैण्डमार्क घंटाघर का क्लॉक टावर
कानपुर शहर का लैण्डमार्क घंटाघर का टावर 1932 में बनकर तैयार हुआ था। स्टेशन के पास होने के कारण इसमें आने जाने वाले यात्रीगण आसानी से समय देख सकते थे। विक्टोरियन और गोथिक शैली के मिश्रण से बना यह टावर आज भी यात्रियों और राहगीरों के लिये सही समय बताने का केन्द्र बिन्दु है।
औद्योगिक विकास रफ्तार की गवाह कमला टावर क्लॉक
शहर के प्रसिद्ध राधाकृष्ण द्वारिकाधीश मंदिर के सामने स्थित कमला टावर 1934 में शहर के प्रसिद्ध उद्योगपति जे.के. समूह के संस्थापक लाला कमलापत सिंहानिया द्वारा निर्मित करवाया गया था। इन्होंने इस स्थान को अपने औद्योगिक मुख्यालय के रुप में स्थापित किया और अपनी माता कमला देवी नाम पर इस टावर का नाम कमला टावर रखा। दक्षिणी हिस्से में मौजूद यह क्लॉक टावर लोगों के लिये समय देखने के प्रमुख साधन आज भी बना हुआ है।

सातवें टावर के विषय में अभी सटीक जानकारी नहीं है कुछ दस्तावेजों के अनुसार सातवां टावर भी कानपुर शहर की मिल एरिया के घनी आबादी वाले क्षेत्र में बनवाया गया था।
इन सभी टावरों की क्लॉक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनकी घड़ियों को विदेश से मंगवाए गए पार्ट्स से तैयार किया गया था। यह सभी घड़ियां चाबी भरने के उपरांत ही स्टार्ट होती है। जिसमें घंटाघर के टावर क्लॉक की घंटी की आवाज लगभग पांच किलोमीटर तक सुनाई देती है।
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Excellent job