Guru Purnima 2026: गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरु साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ब्रह्मा, विष्णु और महेश द्वारा रची गयी सृष्टि में यदि कोई सर्वश्रेष्ठ है तो वह गुरु है। गुरु का अर्थ मात्र शिक्षक से नहीं है, अपितु गुरु वह है जो आपको आध्यात्मिक, नैतिक और संस्कारिक ज्ञान से अवगत कराते हुये आपको आत्मचिंतन की गहराई में ले जाकर आपको स्वयं से परिचित कराते हुये मार्गदर्शित करते है। गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः भारत की पावन धरती पर गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश माना गया है।
गुरु अंधकार से प्रकाश के मार्ग की ओर करता है, प्रशस्त
प्रत्येक वर्ष आषाढ़ माह की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला त्योहार गुरु पूर्णिमा का पर्व इस वर्ष 29 जुलाई दिन बुधवार को भारत देश की धार्मिक भूमि पर धूम धाम से मनाया जा रहा है। गुरु शब्द में ‘गु’ को अंधकार और ‘रु’ की तुलना प्रकाश से की गयी है।

इस तरह जो ईश्वर या गुरु आपको अंधकार के मार्ग से प्रकाश की ओर प्रशस्त करें वही गुरु है। फिर वह मार्ग शिक्षा, आध्यात्म, नैतिक और संस्कारिक कोई भी हो सकता है। प्रत्येक व्यक्ति के पृथ्वी लोक पर जन्म लेने के बाद उसके माता पिता प्राथमिक गुरु होते है। उसके उपरांत शिक्षक और धर्म व्यक्ति के जीवन के मार्गदर्शक के रुप में गुरु की भूमिका निभाते है।
प्राचीन ऋषि-मुनि करते थे, गुरुपूर्णिमा के दिन से चातुर्मास की शुरुआत
मान्यता है कि प्राचीन काल में ऋषि- मुनि आषाढ़ की पूर्णिमा के दिन से 4 महीने तक एक ही स्थान पर तपस्या करके चातुर्मास की शुरुआत करते हुये ज्ञान का प्रचार प्रसार किया करते थे। भगवान बुद्ध ने सारनाथ में गुरुपूर्णिमा के दिन अपना पहला उपदेश दिया था। जिसके कारण आज के दिन को धर्मचक्र प्रवर्तन दिवस के रुप में भी मनाया जाता है।
गुरुपूर्णिमा के दिन जन्में महर्षि वेद व्यास ने हिंदू धर्म के आधार प्राचीन और पवित्र ग्रंथ महाभारत, पुराण और वेदों की रचना की थी। इसलिये पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन को व्यास पूर्णिमा के रुप में मनाये जाने की परंपरा पौराणिक काल से मानी जाती है।
संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति का ज्ञान है, ऋग्वेद
वेदों में ईश्वरीय, चिकित्सा, गणित, ज्योतिष के साथ अन्य कई विषयों का ज्ञान संग्रहित है। माना जाता है कि वेद ज्ञान ईश्वर द्वारा ऋषि मुनियों को दिये जाते थे उस ज्ञान को महर्षि वेद व्यास ने वेदों में वर्णित किया था।
10 मण्डल, 1028 सुक्त का संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति से सबंधित ज्ञान का सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद है। इसमें देवी देवताओं को प्रसन्न करने के लिये लगभग 11 हजार मंत्र वर्णित है।ऋग्वेद में वर्णित मंत्रों का उच्चारण विभिन्न हिंदू धर्म के विभिन्न संस्कारों में देवी देवताओं का आह्रान करने के लिये किया जाता है।

शुक्ल और कृष्ण दो भागों में विभाजित यर्जुवेद में विभिन्न यज्ञों से संबंधित मंत्रों का भण्डार है। जबकि तीसरा सामवेद में मंत्र संगीत रुप में वर्णित है। चौथा अथर्ववेद चिकित्सा और विज्ञान का वेद है जिसमें वर्णित चिकित्सकीय ज्ञान का उपयोग पौराणिक काल में देवी देवता ऋषि-मुनि उपचार किया करते थे।
वेदव्यास द्वारा लिखित महाभारत में कुरुक्षेत्र के मैदान में श्रीकृष्ण द्वारा दिये गये उपदेश और महाभारत के 18 दिनों के युद्ध का वर्णन देखने को मिलता है।

जबकि पुराणों में देवी देवताओं की कथाओं समेत प्रलय और पुनः सृष्टि की उत्पत्ति जीव जन्तुओं की उत्पत्ति के साथ पूरे ब्रह्मांड का कालचक्र महर्षि वेद व्यास द्वारा वर्णित किया गया है। इसी वजह से इस तिथि को सनातन धर्म की देन महर्षि वेद व्यास को गुरु रुप में पूजने का विधान सदियों पुराना है।
गुरु पूर्णिमा के दिन भगवान शिव ने दिया था, सप्तऋषियों को योग ज्ञान
कुछ कथाओं के अनुसार भगवान शिव को आदि गुरु की संज्ञा दी गयी है। माना जाता है शिवजी ने गुरुपूर्णिमा के दिन कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भारद्वाज आदि सप्तऋषियों को योग ज्ञान दिया था जिसके बाद से गुरु शिष्य परंपरा प्रारम्भ हुई थी।

पावन त्योहार गुरु पूर्णिमा के दिन पीले वस्त्र धारण कर चंदन, अक्षत, फूल, मिठाई अर्पित कर ॐ गुरुवे नमः का जप करते हुये विधि विधान से गुरुओं का पूजन अर्चन करने से जीवन में ज्ञान और उचित मार्गदर्शन प्राप्त होता है। साथ ही वस्त्र, पढ़ने लिखने की सामग्री दान में देने से सुख समृद्धि और ज्ञान में वृद्धि होती है।
‘जय गुरु देव’ ‘तस्मै श्री गुरवे नमः’
समाप्त……
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