J.K. Temple Janmashtami Mahotsav: औद्योगिक नगरी कानपुर के प्रसिद्ध जे.के. मंदिर में 6 दिवसीय श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव बुधवार देर रात महाआरती के साथ भव्य रूप से संपन्न हुआ। पिछले वर्षो के मुकाबले इस वर्ष मंदिर में भक्तों की तादाद लाखों की संख्या को पार कर गई। मंदिर प्रशासन और रिद्म ग्रुप के कलाकारों ने श्रीकृष्ण के बाल लीलाओं के मनभावन प्रस्तुतिकरण के साथ ही कार्यक्रम के अंतिम दिन श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंगों के मनोरम दृश्यों को प्रस्तुत कर जन्माष्टमी महोत्सव को भव्य स्वरुप प्रदान किया।
इन प्रसंगों में श्रीकृष्ण का राज्याभिषेक, द्रौपदी चीरहरण और कुरुक्षेत्र में गीता उपदेश का बृहद् स्तर पर सजीव मंचन हुआ। जिसमें एक नारी का अपमान और कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन द्वारा अपने भ्राताओं का रक्त बहता देख दर्शक भावुक हुए तो वहीं श्रीकृष्ण के राज्याभिषेक को देखकर भक्तों का हृदय भाव भक्ति से परिपूर्ण हुआ।

कार्यक्रम के अंतिम दिन पहले प्रसंग में द्वारिका में श्रीकृष्ण के राज्याभिषेक का कार्यक्रम शुरु हुआ जिसमें भगवान श्रीकृष्ण को द्वारिका के सिंहासन पर बैठाकर उनका धूमधाम से राजतिलक किया गया। इस प्रस्तुति में पूरा मंदिर प्रांगण द्वारिकाधीश के जयकारों से गूंज उठा।
इसमें कलाकारों ने अपनी माधुर्य प्रस्तुति में दिखाया कि कंस का वध करने के बाद भी श्रीकृष्ण स्वयं राजा बनने के जगह उग्रसेन को राजा बनाया और बाद में द्वारिका नगरी बसाकर धर्म की स्थापना की। यह दृश्य एक राजा को धर्म और अपनी प्रजा का हितैषी होने का संदेश देता है।
मंचन में द्रौपदी की लज्जा बचाने के लिए प्रकट हुए श्रीकृष्ण
दूसरे प्रसंग में जब भरी सभा में दुशासन ने द्रौपदी का चीरहरण करना शुरू किया और उस समय पांचों पांडव, गुरु द्रोण सिर झुकाये और भीष्म पितामह बैठे देखते रहे। तभी द्रौपदी द्वारिकाधीश महाराज को याद करते हुए उनका मनन करने लगती है।उस दृश्य में श्रीकृष्ण का द्रौपदी की लज्जा बचाने के लिए प्रकटीकरण स्त्री के सम्मान के लिए श्रीकृष्ण का यह स्वरूप भक्तों बेहद प्रसन्नचित करने वाला था।

जिसमें दुशासन द्रौपदी का चीरहरण करने में थक कर धरती पर गिर जाता है। और श्रीकृष्ण की कृपा से द्रौपदी के साड़ी नें विस्तार रूप धारण कर लेती है। श्रीकृष्ण की यह लीला से भक्तों को पथप्रदर्शक के रूप में संदेश देती है कि जब मनुष्य सभी हतोत्साहित होकर हार जाता है। और पवित्र एवं सच्चे हृदय से ईश्वर को पुकारता है तो ईश्वर किसी न किसी रूप अवश्य अवतरित होते है।
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत”
महाभारत के दृश्य को तीसरे प्रसंग में भव्य रूप में प्रदर्शित किया गया। जिसमें श्रीकृष्ण के विराट रुप के दर्शन हुए इस दृश्य में एक तरफ कौरवों की विशाल सेना मौजूद थी। वहीं केवल पांच पांडव युद्ध के मैदान में कौरवों की सेना का सामना करने के लिए डटे थे। बीच में अर्जुन के रथ को सारथी बन श्रीकृष्ण चला रहे थे। उसी समय अर्जुन गांडीव रख कर युद्ध से पीछे हटते हुए श्रीकृष्ण से कहते है।

‘हे! माधव इस कुरुक्षेत्र युद्ध के मैदान में दूसरी सब अपने है। मैं इनसे युद्ध नहीं कर सकता। उसी समय श्रीकृष्ण अर्जुन को श्रीमद्भगवद् गीता का उपदेश देते हुए कहते है“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।। जिसका अर्थ है कि व्यक्ति को केवल अपना कर्म करते रहना चाहिए। फल की चिंताओं को ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए। जब-जब धरती पर अधर्म बढ़ता है। तब-तब धर्म की स्थापना के लिए ईश्वर स्वयं अवतरित होते है।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।। फल की चिंता करके अपने कर्म को फल का कारण मत बनाओं। न जायते मियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरिते।। ‘हे! अर्जुन आत्मा किसी काल में न जन्म लेती है न मरती है। यह शाश्वत और पुरातन है। इस प्रसंग के दौरान मंदिर प्रांगण में मौजूद भक्तगण ने जीवन में किए जाने वाले कर्मो के महत्व से परिचित हुए। श्रीमद्भगवद् गीता का यह उपदेश संदेश देता है कि कर्म ही सर्वश्रेष्ठ है।
छप्पन्न भोग और श्रीकृष्ण का हुआ राज्याभिषेक
2026 के जन्माष्टमी महोत्सव के अंतिम दिन श्रीकृष्ण की छठी पूजन के दौरान जे.के. मंदिर प्रांगण में छप्पन्न भोग और जगत के पालनहार, जगत सुंदर की इन तीनों लीलाओं के प्रसंगो के उपरांत रात्रि काल में 108 दियों की महाआरती की गई। जिसमें शामिल समस्त भक्तगण, अधिकारी और कर्मचारीगण श्रीकृष्ण की भक्ति और उनकी जीवनपर्यंत चलने वाली लीलाओं के दृश्यों को देखकर भावविभोर हो उठे।

कार्यक्रम के अंत में मंदिर के प्रबंधक ने कहा कि जे.के. मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि संस्कारों की उपज का केंद्र भी है। श्रीकृष्ण की लीलाओं के प्रसंगो द्वारा भक्तों को यह संदेश देने का प्रयत्न किया गया है कि श्रीकृष्ण माखन चोर होने के साथ उपदेशक, राजनीतिज्ञ, सच्चे प्रियतम, सखा और जगद्गुरु भी हैं।
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