ShriKrishna-Rukmini Vivah: धर्म और विजय का प्रतीक प्रेम जगत के पालनहार श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के विवाह में प्रतीत होता है। श्रीकृष्ण और रुक्मिणी का विवाह यह बताता है कि जब भावना एवं नीयत सच्ची हो तब स्वयं ईश्वर भी अपने भक्त की पुकार सुनने के लिए प्रकट हो जाते है। लक्ष्मी जी के रूप में अवतारित देवी रुक्मिणी पांच भाइयों में इकलौती बहन थीं।
कुछ कथाओं के अनुसार देवी रुक्मिणी बचपन से ही श्रीकृष्ण की लीलाओं के बारे में सुनकर वह उनसे बहुत प्रभावित थी और उन्होंने बचपन से ही श्रीकृष्ण को अपने पति रूप में वरण कर लिया था। लेकिन जब रुक्मिणी विवाह योग्य हुई तब उनके बड़े भाई रुक्मी ने अपने मित्र चेदि नरेश शिशुपाल से देवी रुक्मिणी का विवाह तय कर दिया था। लेकिन यह विवाह देवी रुक्मिणी को बिल्कुल मंजूर नहीं था।
माना जाता है कि जिसके उपरांत उन्होंने श्रीकृष्ण को पत्र लिखा कि “हे जगत-सुंदर! हे अच्युत! मैंने आपके गुणों से प्रभावित होकर आपको अपने पति रूप में वरण कर लिया है। मैं शिशुपाल जैसे अधर्मी से विवाह नहीं कर सकती। आप मुझ पर कृपा करें और विवाह से पहले मुझे हरण कर अपने साथ ले जाए।”
देवी रुक्मिणी द्वारा श्रीकृष्ण को प्रेषित पत्र इतिहास का पहला प्रेम पत्र
देवी रुक्मिणी ने अपनी संपूर्ण मनोव्यथा पत्र में लिखकर अपनी सखी सुनंदा के माध्यम से अत्यंत सुंदर और गोपनीय तरीके से श्रीकृष्ण को प्रेषित किया था।
श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध में इस पत्र का वर्णन बहुत विस्तार से देखने को मिलता है। जिसमें देवी रुक्मिणी द्वारा श्रीकृष्ण को भेजा गया यह पत्र मात्र प्रेम पत्र नहीं, बल्कि एक स्त्री के आत्मसम्मान और अपने जीवन साथी को चुनने के अधिकार का पहला घोषणापत्र था।
श्रीकृष्ण रुक्मिणी का पत्र पढ़ते ही अपने सारथी दारुक को रथ तैयार करने के लिए कहते है और द्वारका के कुंडिनपुर पहुंच जाते है। युद्ध की बनती स्थिति को देखते हुए श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम अपनी सेना के साथ श्रीकृष्ण के रथ के पीछे चल देते है। जैसे ही श्रीकृष्ण कुंडिनपुर पहुंचते है। वहां देखते है कि शिशुपाल अपनी विशाल सेना के साथ बरात लेकर पहले से मौजूद था। उसी समय श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी को अपने रथ पर बैठाकर द्वारिका की ओर चल पड़ते है। यह देखकर शिशुपाल और जरासंध की सेना क्रोधित होकर श्रीकृष्ण से युद्ध प्रारम्भ कर देती है।
देवी रुक्मिणी के कहने पर रुक्मी के प्राणों का हरण करने से स्वयं को रोकते है, श्रीकृष्ण
रुक्मिणी का बड़ा भाई रुक्मी श्रीकृष्ण को मारने की प्रतिज्ञा ले चुका था। लेकिन वह युद्ध में हार गया और श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी के कहने पर रुक्मी के प्राणों का हरण करने से स्वयं को रोक लिया था। जिसके बाद श्रीकृष्ण ने देवी रुक्मिणी से द्वारिका में वैदिक “रीति-रिवाजों” के साथ धूमधाम से विवाह संपन्न किया।
ऐसा ही श्रीकृष्ण और देवी रुक्मिणी के विवाह का भव्य नाजारा कानपुर के जे.के. मंदिर, कमला नगर, कानपुर में जन्माष्टमी के एक दिन पहले से शुरु हुए भगवान की छठी तक चलने वाले कार्यक्रमों में 8 सितंबर मंगलवार को रिदम ग्रुप के कलाकारों द्वारा मनभावन प्रस्तुति देखने को मिली। इस भव्य आलौकिक दृश्य को देखने के लिए भारी संख्या में भक्तगण, जे.के. संस्थान के अधिकारी और कर्मचारी मंदिर प्रांगण में मौजूद रहे।
देवी रुक्मिणी के इस प्रेम और साहस से प्रेरणा मिलती है कि जब स्त्रियों को अपनी बात को कहने के लिए अधिकार प्राप्त नहीं थे तब देवी रुक्मिणी ने अपने आत्मसम्मान और अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज उठाई और अधर्मी शिशुपाल के विवाह प्रस्ताव को ठुकरा कर श्रीकृष्ण से विवाह करने का निर्णय लिया और प्रेम एवं धर्म के प्रति आस्था को जगत में विस्तारित किया। देवी रुक्मिणी के श्रीकृष्ण को दिए गये पत्र के महत्व को देखते हुए महाराष्ट्र में विवाह के समय “रुक्मिणी स्वयंवर” का पाठ आज भी प्रचलित है।
(नोटः पाठक वर्ग इस लेख में लिखित तथ्यों को अपने मनोभावों के अनुरुप ग्रहण करें, इसमें लिखित तथ्य प्राप्त जानकारी मात्र है)
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