Hartalika Teej Vrat: महलों की राजकुमारी सौंदर्य और करुणा की सागर माता पार्वती और शीश पर गंगा, गले में नाग धारण किये वैरागी, औघड़ और भस्मधारी भगवान शिव का विवाह ब्रह्मांड का पहला प्रेमविवाह माना गया है। दोनों के आत्मीय मिलन की गाथा को बयां करता अटूट प्रेम संपूर्ण सृष्टि के संतुलन को स्वयं में समाहित किये हुए है।
कथाओं के अनुसार पार्वती जी ने शिव को प्राप्त करने के लिए अन्न-जल और महलों के सुखों को त्यागकर जंगलों में घोर तपस्या की थी। जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने पार्वती जी को पत्नी रूप में स्वीकार किया। भगवान शिव ने माता पार्वती को ज्ञान दिया तो पार्वती जी ने भगवान शिव को गृहस्थ जीवन सिखाया।

दोनों एक दूसरे पूरक होने के बावजूद उनके विचारों को अपने में समाहित कर एक-दूजे के हो गए। पार्वती जी की तपस्या उनके प्रेम के प्रति त्याग का प्रमाण देती है। वहीं शिव द्वारा माता पार्वती की परीक्षा लेना साबित करता है कि धैर्य और त्याग का होना प्रेम की पवित्रता को गहराई से समझने के लिए जरूरी है। जिसकी वजह से आज भी स्त्रियां अपने पति के रूप में शिव को तलाश करती है। और पुरुष भी पार्वती जैसी समर्पित पत्नी की कामना करते है।
2026 की हरितालिका तीज में बन रहे है बेहद शुभ संयोग
इस बार हरितालिका तीज 2026 में सोमवार व्रत, गणेश चतुर्थी आदि तीन त्योहारों की वजह से 14 सितंबर को बेहद शुभ संयोग बन रहे है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाए जाने वाले तीज के त्योहारों में हरितालिका तीज को विशेष स्थान प्राप्त है।

इसमें सुहागिनें अखंड सौभाग्य और कुंवारी कन्यायें मनचाहा वर प्राप्ति के लिए यह व्रत रखती है। हरियाली तीज और कजरी तीज के बाद हरितालिका तीज को सबसे कठिन तीज व्रत माना जाता है क्योंकि इस दिन महिलाएं पति की लंबी उम्र के लिए 24 घंटे का निर्जला व्रत रखती हैं।
हरित का अर्थ है हरण जबकि आलिका को कहते है सखी
हरितालिका दो शब्द के संयोग से बना है इसमें हरित का मतलब है हरण जबकि आलिका को सखी कहा गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा हिमालय अपनी पुत्री पार्वती का विवाह जगत पालनहार श्रीहरि से करवाना चाहते थे लेकिन पार्वती जी बचपन से ही भगवान शिव को अपना पति मान चुकी थी।

जिसकी वजह से वह इस विवाह के लिए राजी नहीं थी। जब उन्होंने अपनी पीड़ा सखी से बतायी तब उनकी सखी ने हरितालिका तीज के दिन पार्वती जी को हरण कर जंगल ले गई थी।
घने जंगलों में फूल पत्तियों का सेवन और बदलते मौसम की पीड़ाओं को सहते हुए माता पार्वती ने तपस्या की थी। अंततः माता पार्वती की अटूट भक्ति और प्रेम से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने दर्शन दिये और पार्वती को पत्नी रूप में स्वीकार किया।
सोलह श्रृंगार से प्रसन्न होती है माता पार्वती
हरितालिका तीज की चली आ रही प्रथा के अनुसार हिंदू धर्म में इस दिन के व्रत और पूजन में महिलाएं प्रातः काल की बेला में व्रत का संकल्प लेती है। और हरे, लाल, गुलाबी सुनहरे वस्त्रों के साथ कंगन, सिंदूर, बिंदी, चूड़ी, पायल, मांग टीका, बाजूबंद, झूमके, हाथफूल, नथ, आरसी और करधनी आदि को धारण कर सिर से पांव तक सोलह श्रृंगार करके व्रत का आरंभ करती है।मान्यता है कि इस दिन महिलाओं द्वारा सोलह श्रृंगार किये जाने से माता पार्वती बेहद प्रसन्न होकर समस्त मनोकामनायें पूर्ण करती है।

व्रत पूजन विधान में मिट्टी और बालू के उपयोग से शिव पार्वती गणेश नंदी और कार्तिकेय की मूर्ति बनाकर फूल पत्तियों से मंडप को सजाया जाता है। और उसमें इन मूर्तियों को रखकर सुहाग सामग्री, बेलपत्र, भांग, धतूरा, शमी के पत्ते, फल, फूल और मिठाई अर्पित करने के बाद दिया जलाकर रात भर महिलायें तीज की कथा जागरण करती है। अगले दिन प्रातः काल के समय दान दक्षिणा के उपरांत व्रत का पारण करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है।
धार्मिक, सामाजिक एवं वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, हरितालिका तीज
प्रेम और समर्पण का प्रतीक पार्वती जी द्वारा भगवान शिव को पाने की इच्छा से किया गया यह व्रत धर्म का परिचायक है। वहीं महिलाओं का सोलह श्रृंगार करके सखियों के साथ एकत्रित होकर रात्रि में जागरण करना सामाजिक बंधनों को भी विस्तारित करती है। जबकि वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाये तो भाद्रपद माह में वर्षा ऋतु में निर्जला व्रत का यह अनुष्ठान पाचन तंत्र को सुचारु रूप से संचालित रखता है। और शरीर को डिटॉक्स करके स्वस्थ रखने में मददगार होता है। इस तरह भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का हरितालिका तीज व्रत धार्मिक, सामाजिक और वैज्ञानिक दृष्टि से भी विशेष महत्व रखता है।

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, झारखण्ड और महाराष्ट्र में इस व्रत को बेहद उत्साहपूर्ण तरीके से मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश के कानपुर में हरितालिका तीज के अवसर पर शहर के मंदिरों को सुंदर झांकियों से सजाया गया है। वहीं शहर की दुकानों में शिव पार्वती नंदी, गणेश और कार्तिकेय सहित शिव परिवार की मिट्टी बालू से बनी मूर्तियों, रंग-बिरंगें फूलों और श्रृंगार की सामग्री से दुकानों में रौनक बिखरी हुई है।
भारतीय संस्कृति का हरितालिका तीज का यह पवित्र त्योहार प्रेम, त्याग का अटूट बंधन, और आस्था के पवित्र उत्सव के रूप में प्रसिद्ध है। यह व्रत हमें सीख देता है कि सत्य, प्रेम, विश्वास और भक्ति की राह पर चलकर से सृष्टि का संहार करने वाले भगवान शिव को भी प्रसन्न किया जा सकता है।
हर हर महादेव…………

