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    Home » Terms of Services » वैदिक सभ्यता के अंत का कारण थी, महाभारत

    वैदिक सभ्यता के अंत का कारण थी, महाभारत

    Shrimad Bhagavad Geeta
    Preeti RathoreBy Preeti RathoreMarch 29, 2026Updated:April 9, 2026 देश No Comments3 Mins Read
    Srimad Bhagavad Geeta
    Srimad Bhagavad Geeta
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    Shrimad Bhagavad Geeta: सत्य और न्याय का युद्ध महाभारत सिहासंन के लिये 18 दिनों तक लड़ा गया 100 कौरवों और पाँच पाण्डंवों का यह युद्ध वैदिक सभ्यता का सबसे बड़ा महायुद्ध माना गया। और इसी युद्ध से वैदिक सभ्यता का अंत हो गया था। महर्षि वेदव्यास ने इसका वर्णन अपने महाकाव्य महाभारत में किया है। इसी युद्ध में कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को श्रीकृष्ण के उपदेशों का वर्णन महाकाव्यों में से एक श्रीमद्भगवद् गीता में किया गया है। गीता में ज्ञान और बुद्धि के भण्डार के साथ श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों के साथ धर्म और अर्थ के प्रवचन भी शामिल है।

    सुखी,जीवन का शलीका है, श्रीमद्भगवद् गीताः

    श्रीमद्भगवद् गीता में सभी वर्गो के लिए महत्वपूर्ण बाते निहित है। इसके श्लोक आज के समय की संस्कृति और शिक्षा को अपने में समाहित किये हुये हैं जो व्यक्ति को सुखी और संतुष्ट जीवन जीने का शलीका सिखते हैं। श्रीमद्भगवद् गीता से लिए गये पाँच उपदेश ऐसे है जिनकों प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में आवश्यक रुप से उतारना चाहिये जिससे वह जीवन में उन सभी कठिनाइयों का मुकाबला करने में सक्षम रह सके जो धर्म और कर्म में आड़े आ रही होती है।

    Srimad Bhagavad Geeta...
    Srimad Bhagavad Geeta…

    श्रीमद्भगवद् गीता के श्लोक है, जीवन के सच्चे मार्गदर्शकः

    यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत| अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् || जब जब धर्म की हानि होती है, अधर्म की वृद्धि होती है। तब तब मैं स्वंय प्रकट होता हूँ।

    ‘कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ यह उपदेश बताता है कि व्यक्ति को अपने कर्म करते रहना  चाहिए। लेकिन उन कर्मों से मिलने वाले फलों की चिंता नहीं करनी चाहिए। जगत विधाता श्रीकृष्ण कहते हैं कि किसी कार्य में अपना सर्वश्रेष्ठ देने पर ध्यान केंद्रित करें कि उससे मिलने वाले फलों के बारे में सोचना व्यर्थ है।

    Srimad Bhagavad Geeta..
    Srimad Bhagavad Geeta..

    नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः|| जिसका अर्थ है “आत्मा अजर अमर है इसको न आग जला सकती है, न पानी भिगों सकता है। न हवा इसे सुखा सकती है। यह श्लोक आत्मा के शाश्वत रूप को प्रदर्शित करता है। और बताता है कि भौतिक शरीर को तो नुकसान हो सकता है। लेकिन आत्मा शाश्वत है इसलिये व्यक्ति को अंतर्मन की ध्वनि पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

    अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति | नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मन: ||श्रीमद्भगवद् गीता का यह श्लोक ज्ञान देता है कि अज्ञानी व्यक्ति  जीवन के मार्ग में भटक जाता है। वह न इस लोक में सुख पाता है। और न परलोक में सुख पा सकता है। इस श्लोक से पता चलता है कि आत्मसंदेह करना ही हमारे लिए सबसे बड़ी बाधा है इसलिए, स्वयं को महत्व देना अपनी क्षमताओं पर विश्वास रखना बेहद जरुरी है।

    त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन: | काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ||श्रीमद्भगवद् गीता यह श्लोक व्यक्ति को काम, क्रोध और लोभ का त्याग करने की प्रेऱणा देता है। भौतिक युग में ये गुण आम व्यक्ति में आना स्वाभाविक है लेकिन इनका त्याग व्यक्ति को कर्म और धर्म के विकास मार्ग की ओर अग्रसरित करते हैं।

    (इस लेख में लिखित बातों को पाठक अपने मनोभावों के अनुसार ही ग्रहण करें) 

    …समाप्त…….

     

    India Shrimad Bhagavad Geeta
    Preeti Rathore
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    पिछले 14 वर्षो से पत्रकारिता क्षेत्र से जुड़ी हूँ। समाचार लेखन, विज्ञापन स्क्रिप्ट लेखन, आध्यात्मिक लेख लिखने के अलावा पत्रकारिता के शिक्षक के रुप में कार्य किया है। मैनें सीएसजेएमयू कानपुर से एम.जे.एम.सी, एम.एस.सी, बी.एड, एल.एल.बी,अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र हिन्दी विषय में परस्नातक एंव राजर्षि टण्डन मुक्त वि.वि. से पीजीडीएमएम की डिग्री प्राप्त की है। मैं अपनी वेबसाइट (Anantpratigya खबर) में पाठक वर्ग को सत्य और स्पष्ट जानकारी से सबंधित खबरें देने हेतु प्रयासरत् रहूँगीं।

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