National Handloom Day: आज पूरा देश 12 वां राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के रुप में माना रहा है। देश के प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2015 में को सर्वप्रथम इसकी शुरुआत की गयी। हथकरघा भारत की हजारों वर्ष पुरानी विरासत है। प्रत्येक वर्ष 7 अगस्त को भारत में “राष्ट्रीय हाथकरघा दिवस” मनाये जाने का मुख्य उद्देश्य स्वदेशी को अपनाना और बुनकरों की मेहनत को सम्मान देने से है।
देश के प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी ने चेन्नई से इसकी शुरुआत की थी और इस दिन को मनाये जाने के लिये 7 अगस्त का चुना जाना 1905 के स्वदेशी आंदोलन से सबंधित है। भारत में बुनकरों द्वारा हाथकरघा से बुनाई के कई प्रमाण मोहनजोदड़ों और हड़प्पा की खुदाई से भी प्राप्त हुये है। इसके उपरांत महात्मा गांधी ने चरखा और खादी को आत्मनिर्भर भारत के प्रतीक के रुप में स्थान दिया था।

हाथकरघा से तैयार किये जाने वाले कपड़े हमारी संस्कृति, कला है। बनारसी, कांजीवरम, पटोला, चंदेरी, भागलपुरी, मणिपुरी आदि साड़ियों की डिजाइनें हमारे देश की संस्कृति की पहचान है।
सैकड़ों बुनकरों की रोजी-रोटी है, हाथकरघा
पूर्वाचंल और बनारस की बनारसी साड़ी, जामदानी, कतान, सिल्क पहचान हैं। इसके अलावा आजमगढ़ चंदौली, मऊ और जौनपुर में आज भी सैकड़ों घरों में बुनकारों द्वारा सड़ियों की बुनाई का कार्य किया जाता है। यह हाथकरघा बुनकरों की रोजी-रोटी का साधन बन चुकी है। हाथकरघा द्वारा एक साड़ी को पूरी तरह से तैयार होने में 20 से 22 दिन का समय आराम से लग जाता है। इसमें जरी के कार्य के साथ साड़ी का डिजाइन आदि हाथों से तैयार किया जाता है।
हाथकरघा महिलाओं के लिये घर बैठे आमदनी का अच्छा साधन है। इसमें किसी प्रकार का कोई बिजली खर्च भी नहीं और प्राकृतिक रंगों और सूत के इस्तेमाल के कारण पूरी तरह इको- फ्रेंडली है।
इतना ही नहीं हाथ से बुने गये ये सूती और सिल्क के कपड़े स्वास्थ्य की दृष्टि से भी काफी लाभकारी होते है। ये गर्मी ठण्डक और सर्दी मे गरमाहट देते है। सभी तरह से लाभकारी यह हाथकरघा उद्योग हमारी संस्कृति और विरासत की धड़कन बनकर प्रत्येक देशवासियों के दिल में बसती है।
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