Shravan Maas 2026: सृष्टि का संहार करने के लिये स्वयं उत्पन्न हुये भगवान शिव तीनों लोको के स्वामी स्वंयभु कहे जाते है। गुजरात स्थित (सोमनाथ), आन्ध्रप्रदेश(मल्लिकार्जुन), उज्जैन (महाकालेश्वर), मध्यप्रदेश (ओंकारेश्वर), उत्तराखण्ड (केदारनाथ), महाराष्ट्र (भीमाशंकर), (घृणेश्वर), (त्र्यंबकेश्वर), तमिलनाडू (रामेश्वरम), वाराणसी (विश्वनाथ), झारखण्ड (वैधनाथ) और श्रीकृष्ण की नगरी द्वारिका गुजरात के नागेश्वर आदि सभी ज्योतिर्लिंग में स्वयंभु बसते है।
भागवत पुराण के अनुसार ब्रह्मा एंव विष्णु के अंहकार को नष्ट करने के उद्देश्य से आदिदेव स्वंय प्रकट्य हुये थे। श्रवण माह में समुद्र मथन में निकला विष ग्रहण कर नीलकंठ बने जब त्रिनेत्र खोला तब कामदेव को नष्ट कर त्रिलोचनधारी बन गये।
जगत जननी माता पार्वती के पति भोले-भाले उमापति जब अपने रुद्र रुप आये तब त्रिपुरासुर का वध करके त्रिपुरारी का रुप धारण किया। सृष्टि में सबका काल्याण करने वाले शंभू कल्याणकारी रुप में शंकर कहलाये। देवी देवता भी पूजे जिनको यमराज भी कापें जिनसे उज्जैन में विराजे कालों के काल महाकाल वह महान् देव महादेव ब्रह्मांड के स्वामी है।
कानपुर के शिवालयों में सावन में भक्तों की भीड़
30 जुलाई से सावन माह के शुरु होते ही शिवालय बम-बम भोले के जयकारे से गुंज उठे। ऐसे में मंदिरों में 3 अगस्त को पड़ने वाला सावन के पहले सोमवार की तैयारियां जोरो पर चल रही है। बाबा के दर्शन के लिये मंदिर आने वाले भक्तगणों की सुरक्षा को देखते हुये पुख्ता इंतजाम किये गये है।
मंदिर प्रशासन के अनुसार सावन में यहाँ लाखों की संख्या में भक्तगण भोलेनाथ के दर्शन के लिये आते है। भक्तों को किसी तरह कि दिक्कतों का सामना न करना पड़े इसके लिये भारी पुलिस बल तैनाती के साथ बैरिगेटिंग लगाकर दर्शन करने की व्यवस्था की गयी है। इसमें मंदिर परिसर से 1 किलोमीटर तक कि दूरी पर वाहनों की अवाजाही पर रोक भी लगाई गई है।
जबकि जाजमऊ गंगा किनारे स्थित सिद्धनाथ मंदिर प्रशासन ने भी व्यवस्था में कोई कमी नही रखी है। सावन में भक्तगणों की उमड़ती भीड़ को देखते हुये मंदिर में वाहनों को खड़े करने और भक्तों को कतार में लगकर दर्शन करने के लिये पुख्ता इंतजाम किये गये है।
महाभारत काल के शिवलिंग है, आनंदेश्वर
शहर के परमट और बाबा सिद्धनाथ के मंदिर सदियों पुराने होने के कारण इनके प्रति शिवभक्तों की आस्था भी बहुत है। कानपुर स्थित परमट मंदिर के इतिहास के बारे में बात की जाय तो कहा जाता है। यहाँ का इतिहास जगत विधाता श्रीकृष्ण के युग महाभारत काल के पूर्व से माना गया है। मान्यता है कि दानवीर कर्ण यहाँ बहने वाली गंगा में स्नान करके शिवलिंग की पूजा किया करते थे। बाद में यह जगह टीले के रुप में परिवर्तित हो गई।
पौरणिक कथाओं के अनुसार यहाँ पर राजा कौशल का राज चलता था। उनकी सभी गायें उसी टीले पर घास चरने के लिये जाती थी। उनमें से आंनदी नाम की एक गाय टीले पर ही अपना सारा दूध गिरा देती थी। जब गायों की देखरेख करने वाले ग्वालों ने राजा कौशल को यह बात बतायी कि आंनदी अपना सारा दूध टीले पर स्थित एक स्थान गिरा देती है। तब राजा कौशल ने टीले की खुदाई करवायी तो गहराई में एक शिवलिंग निकला। इस अद्भुद् चमत्कारिक शिवलिंग को देखकर सभी आश्चर्य चकित रह गये। और आंनदी गाय के नाम से शिवलिंग का नाम आंनदेश्वर रख दिया। तभी से परमट स्थित भोलेनाथ का मंदिर आंनदेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
जाजमऊ का सिद्धनाथ मंदिर है, छोटा काशी
जबकि कानपुर में जाजमऊ स्थित छोटा काशी के रुप से प्रसिद्ध सिद्धनाथ मंदिर का इतिहास भी सैकड़ों वर्ष पुराना है। माना जाता है कि त्रेता युग में राजा ययति का इसी स्थान पर किला था। जब राजा ययति ने अपनी एक गाय को रोज उसी टीले पर दूध गिराते देखा तो उन्होंने उस टीले की खुदाई करवाई जहाँ बेहद गहराई में एक शिवलिंग दिखाई दिया। राजा ययति ने इसी स्थान पर शिव मंदिर बनावा दिया।

कहा जाता है कि आज तक सिद्धनाथ धाम के शिवलिंग की गहराई का आजतक कोई अनुमान नहीं लगा सका है। मान्यता है कि राजा ययति ने इस मंदिर को काशी के पवित्र तीर्थ जैसा स्थान देने के लिये सौ यज्ञों का संकल्प लिया था।
लेकिन 99 यज्ञ पूरे होने के उपरांत जब राजा ययति सौवां यज्ञ करा रहे थे तभी आसमान में एक उड़ता कौआ ह्ड्डी का टुकड़ा अपनी चोंच में लिये जा रहा था और वह हड्डी का टुकड़ा यज्ञ में गिरने से यज्ञ अपूर्ण रह गया और तभी से कानपुर के जाजमऊ स्थित बाबा सिद्धनाथ के मंदिर को छोटा काशी कहा जाने लगा।
गंगा किनारे शांत वातावरण में स्थित कानपुर के इन सदियों पुराने प्रसिद्ध मंदिरों से शिव भक्तों आपार ऋद्धा जुड़ी है। जिसके कारण सैकड़ों की संख्या में भक्तगण भगवान शिव के पावन माह सावन में दर्शन के लिये आते है।
समाप्त…..
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(इस लेख में लिखित तथ्यों को पाठक अपने मनोभावों के अनुरुप ही ग्रहण करें। इसमें लिखित तथ्य जनकारी मात्र है, यह किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से नहीं लिखे गये है।)


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